अनुराग कश्यप की नई फिल्म Choked: पैसा बोलता है का मूवी रिव्यु।

मुंबई का एक मिडिल क्लास घर, एक नौकरी, एक सिंगर बनने का सपना, और मोदी जी के 500 हज़ार के नोट बंद करने और उससे उत्पन्न हालात को इस एक फ़िल्म में अनुराग कश्यप ने दिखाया है।

इस फ़िल्म में सिर्फ जीवित किरदार ही नहीं है कुछ ऐसे किरदार भी हैं जो ऐसे तो निर्जीव होते हैं लेकिन उनके बिना एक साधारण व्यक्ति भी बहुत मुश्किल में पड़ जाता है। इसमें से एक किरदार है पैसा, जिसका जिक्र टाइटल में भी है कि ‘पैसा बोलता है’। इस फ़िल्म में सच में पैसे से आवाज़ आती नज़र आएगी। ऐसी आम बोलचाल वाली भाषा का तो इस्तेमाल नहीं है लेकिन घर में सीपेज, धातु के पाइपों के माध्यम से गगनभेदी ध्वनि को पैसा का आवाज़ दिया गया है।

तो होता यूं हैं कि एक रात, लगभग 3 बजे, सीपेज से आवाज़ आती है। सरिता (सैयामी खेर) अपनी रसोई के सिंक के नीचे के पाइप को जैसे ही निकालती है, गंदा सीवरेज का पानी उसकी रसोई के फर्श पे आ जाता है और साथ ही आता है प्लास्टिक की थैलियों में लिपटे नकदी के छोटे-छोटे रोल।

फ़िल्म की कहानी क्या है?

सैयामी का किरदार सरिता ने सुशांत से शादी की है, जो रोशन मैथ्यू द्वारा निभाया गया है। उनका एक बेटा है। तीन लोगों का परिवार समाज के मानकों के अनुसार अजीब है। सुशांत घर पर रहने वाले पति हैं, इसलिए कि वह बार बार नौकरी बदलता है। वह एक संगीतकार बनना चाहता है लेकिन वास्तव में संघर्ष के दौर से गुजरना नहीं चाहता। सरिता एक स्बैंक कर्मचारी हैं। लेकिन वह एक गायिका बनना चाहती थी, लेकिन एक बार मंच पर उसकी आवाज़ रुकती है और फिर वो कभी गा नहीं पाती है।

सरिता और सुशांत का रिश्ता भी उस दिन से बदल जाता है, वे एक-दूसरे से नफरत नहीं करते, लेकिन प्रेम भी ऐसा कुछ नहीं है बस जीवन चल रहा है। और पैसा उनके जीवन में बहुत मायने रखता है।

कहानी में मोड़

8 नवंबर 2016 को शाम को 8 बजे पीएम नरेंद्र मोदी जी का डिमोनेटाइजेशन भाषण के पांच सौ, हज़ार ले नोट बंद होना, फिर नियमों का बार बार बदलना, बूढ़े लोगों की परेशानी, नेताओं का बैंक कर्मचारियों के साथ मिलकर इस मौके को अवसर में बंदलने की कोशिश सब इस फ़िल्म में एक एक दो दो सीन्स में आसानी से कहा गया है। लेकिन ये इतना प्रभावशाली तरीके से फिलमाया गया है कि फ़िल्म देखने के बाद भी वो सारी चीज़ें याद रहती हैं।

सरिता के रूप में सैयामी ने शानदार अभिनय किया हैं। सरिता का किरदार अपनी आंखों से बहुत कुछ कहता है। जब वह अपने दैनिक कामों के बारे में बताती है, तो ऐसा लगता है कि ये तो लगभग हर कमाती हुई मिडिल क्लास महिला की परेशानी है। सुशांत के रूप में रोशन भी उतने ही प्रभावी हैं।

अनुराग कश्यप अपनी बातों को बहुत सटल तरीके से कह गए हैं। उनकी डायरेक्शन में बनी कुछ ही ऐसी फिल्में हैं जो रिएलिटी के करीब होते हुए भी आपको बहुत परेशान नहीं करती हैं। यह फ़िल्म उन्ही में से एक है। इसका कारण है इस फ़िल्म का अंत जो कि आपको एक राहत देता है। एक निर्देशक जब अपनी बात तटस्थ भाव से जब अपनी बात करता है तो जो लोग उनके राजनीतिक विचारों से कोई सरोकार नहीं रखते हैं वे भी उनकी कला की प्रशंसा करते हैं। इसलिए आप किसी भी राजनीतिक विचार से प्रभावित हैं या हैं यह फ़िल्म आपको निराश नहीं करेगी।

इस फ़िल्म को आप नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं।

गुलशन।

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