नागालैंड राज्य में कुत्तों के मांस का व्यापार बंद होने से स्थानीय लोगों में है नाराज़गी।

नागालैंड में कुत्ते और उसके मांस की बिक्री पर प्रतिबंध को लेकर स्थानीय लोग गुस्से में हैं। लोगों का कहना है कि वे कई सालों से कुत्ते का मांस खा रहे हैं, खाने-पीने पर प्रतिबंध लगाना बिल्कुल गलत है। इसी समय, कुछ संगठन काफी समय से मांस के लिए कुत्तों की क्रूरता को आवाज़ दे रहे हैं।

आपको बता दें कि नागालैंड में कुत्ते का मांस देश में सबसे ज्यादा बेचा जाता है। इसके अलावा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में कुत्ते का मांस खाया जाता है। नागालैंड और असम की सीमाओं पर स्थित दीमापुर, कुत्ते के मांस का सबसे बड़ा बाजार है। वही बाजार पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्रों में कुत्तों की तस्करी के तार जोड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों से चोरी किए गए कुत्तों की तस्करी की जाती है। कुत्तों को दीमापुर के कसाई खानों में ले जाया जाता है और यहाँ से कुत्तों का मांस बाज़ार में बिक्री के लिए आता है। कहा जाता है कि दीमापुर बाजार में कुत्तों को लाने का काम कई छोटे-छोटे गिरोहों को सौंपा जाता है। ये गिरोह असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर से लेकर नागालैंड के दीमापुर बाजार तक कुत्तों को ले जाते हैं। कुत्तों को पकड़ने की कीमत 50 से 150 रुपये तक दी जाती है।

दीमापुर बाजार में कुत्तों को एक हजार रुपये तक में बेचा जाता है। ज्यादातर कुत्तों का मांस त्योहारों पर बेचा जाता है। इस दौरान मांस की कीमत 4 हजार रुपये तक हो जाती है। कुछ लोग यहां तक ​​कहते हैं कि कुत्ते पकड़ने वाले अक्सर पालतू कुत्तों को पकड़ते हैं और बोरियों में बंद कर दीमापुर बाजार में ले आते हैं।

यहां से, कुत्तों का मांस फिर बिक्री के लिए छोटी दुकानों और कई होटलों तक पहुंचता है। आमतौर पर छोटे दुकानदार कुत्ते के मांस को सुखाकर बेचते हैं। इसकी बिक्री 200 से 250 रुपये प्रति किलो के दायरे में है। यहां तक ​​कि नागालैंड के होटलों और भोजनालयों में भी कुत्ते का मांस चाव से खाया जाता है। ह्यूमन सोसाइटी इंटरनेशनल, कुत्तों पर बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक संगठन, के अनुसार हर साल नागालैंड में 30 से 40 हज़ार कुत्तों की तस्करी की जाती है।

लेकिन नागालैंड और आस-पास के राज्यों के लोगों में गुस्सा है कि यह निर्णय में नागा जनजातियों से कोई परामर्श किए बिना लिया गया था, जो अपने भोजन संस्कृति के हिस्से के रूप में कुत्ते के मांस का सेवन करते हैं। यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि इस निर्णय नागालैंड के अनुच्छेद 371 को कैसे नजरअंदाज कर दिया जो नागालैंड के लोगों को नागा जनजातियों को अपने संस्कृति का अभ्यास करने और उनके प्रथागत कानून और सामाजिक व्यवहार को बनाए रखने की अनुमति देने का विशेष अधिकार प्रदान करता है।

गोमांस, सूअर का मांस, मछली, या चिकन खाना किसी की पसंद या संस्कृति को नैतिक रूप से स्वीकार्य कैसे बनाता है? “कुत्ते का मांस नहीं खाना” भी एक की संस्कृति का हिस्सा है, कुछ समुदाय हैं जहाँ कुत्ते के मांस को उनकी खाद्य संस्कृति के हिस्से के रूप में लिया जाता है।

गुलशन।

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