मन

मन की एक ऐसी शक्ति है, जिससे वह अपने” अन्दर जो कुछ हो रहा है उसे देख सकता है। इसको अन्त – पर्यवेक्षण-शक्ति कह सकते हे। मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूँ, फिर साथ ही में मानो एक और व्यक्ति बाहर खडा हूँ और जो कुछ कह रहा हूँ, वह जान-सुन रहा हूँ।

तुम एक ही समय काम और चिन्तन दोनो कर रहे हो, परन्तु तुम्हारे मन का एक और अंश् मानों बाहर खडे होकर तुम जो कुछ चिन्तन कर रहे हो, उसे देख रहा है। मन की समस्त शक्तियों को एकत्रित करके मन पर ही उनका प्रयोग करना होगा। जैसे सूर्य की तीक्षण किरणो के सामने घने अन्धकारमय स्थान भी अपने गुप्त तथ्य खोल देते है, उसी तरह यह एकाग्र मन अपने सब अन्तरतम रहस्य प्रकाशित कर देगा।

तब हम विश्वास की सच्ची बुनियाद पर पहुंचेंगे। तभी हमको सही-सही धर्म-प्राप्ति होगी । तभी, आत्मा है या नही, जीवन केवल् इस सामान्य जीवितकाल तक ही सीमित है अथ्वा अनन्तकालव्यापी है और संसार मे कोई ईश्वर है या नही, यह सब हम स्वयं देख सकेंगे। सब कुछ हमारे ज्ञानचक्षुओं के सामने” उद्धभासित हो उठेगा।

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